भारत में लिंगानुपात जनसंख्या की संरचना और महिलाओं की सामाजिक स्थिति को समझने का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक है। इसके माध्यम से पता चलता है कि जनसंख्या में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या कितनी है। भारत में लिंगानुपात का अध्ययन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें राज्यों, ग्रामीण क्षेत्रों और नगरीय क्षेत्रों के बीच उल्लेखनीय अंतर पाया जाता है।
लिंगानुपात क्या है?
लिंगानुपात (Sex Ratio) का अर्थ प्रति 1,000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या से है। उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र का लिंगानुपात 950 है, तो वहाँ प्रत्येक 1,000 पुरुषों पर 950 महिलाएँ हैं।
लिंगानुपात के तीन अलग-अलग संकेतकों को समझना आवश्यक है:
- समग्र लिंगानुपात: पूरी जनसंख्या में प्रति 1,000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या।
- बाल लिंगानुपात: सामान्यतः 0–6 वर्ष की आयु के बच्चों में प्रति 1,000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या।
- जन्म के समय लिंगानुपात: किसी अवधि में प्रति 1,000 लड़कों के जन्म पर लड़कियों के जन्म की संख्या।
इन तीनों संकेतकों के आँकड़े और उनका अर्थ अलग-अलग है।
भारत में लिंगानुपात का ऐतिहासिक विकास
भारत में लिंगानुपात में दीर्घकालीन उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। वर्ष 1901 में यह 972 था, जो 1951 में घटकर 946 और 1991 में 926 रह गया। इसके बाद 2001 में इसमें सुधार होकर यह 933 तथा 2011 में 943 हो गया।

भारत में लिंगानुपात का ऐतिहासिक क्रम
| जनगणना वर्ष | लिंगानुपात |
| 1901 | 972 |
| 1911 | 964 |
| 1921 | 955 |
| 1931 | 950 |
| 1941 | 945 |
| 1951 | 946 |
| 1961 | 941 |
| 1971 | 930 |
| 1981 | 934 |
| 1991 | 926 |
| 2001 | 933 |
| 2011 | 943 |
भारत में लिंगानुपात के नवीनतम आँकड़े
भारत की नवीनतम पूर्ण जनगणना 2011 की है। इसलिए राज्यवार समग्र लिंगानुपात की तुलना के लिए अभी भी जनगणना 2011 के आँकड़े आधार हैं। दूसरी ओर, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019–21) ने कुल जनसंख्या के लिंगानुपात के लिए अलग अनुमान प्रस्तुत किया
| स्रोत | क्षेत्र | लिंगानुपात |
| जनगणना 2011 | भारत | 943 |
| जनगणना 2011 | ग्रामीण भारत | 949 |
| जनगणना 2011 | नगरीय भारत | 929 |
| NFHS-5 (2019–21) | भारत | 1,020 |
| NFHS-5 (2019–21) | ग्रामीण भारत | 1,037 |
| NFHS-5 (2019–21) | नगरीय भारत | 985 |
भारत में लिंगानुपात का राज्यवार वितरण (2011)

भारत में लिंगानुपात का वितरण राज्यों के बीच काफी असमान था। जनगणना 2011 के अनुसार केरल में सर्वाधिक 1,084, जबकि हरियाणा में सबसे कम 879 महिलाएँ प्रति 1,000 पुरुष थीं। केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में लिंगानुपात अपेक्षाकृत अधिक था। इसके विपरीत हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार में यह राष्ट्रीय औसत से कम था।
| राज्य | लिंगानुपात (2011) |
| आंध्र प्रदेश | 993 |
| अरुणाचल प्रदेश | 938 |
| असम | 958 |
| बिहार | 918 |
| छत्तीसगढ़ | 991 |
| गोवा | 973 |
| गुजरात | 919 |
| हरियाणा | 879 |
| हिमाचल प्रदेश | 972 |
| जम्मू एवं कश्मीर | 889 |
| झारखंड | 949 |
| कर्नाटक | 973 |
| केरल | 1,084 |
| मध्य प्रदेश | 931 |
| महाराष्ट्र | 929 |
| मणिपुर | 985 |
| मेघालय | 989 |
| मिजोरम | 976 |
| नागालैंड | 931 |
| ओडिशा | 979 |
| पंजाब | 895 |
| राजस्थान | 928 |
| सिक्किम | 890 |
| तमिलनाडु | 996 |
| त्रिपुरा | 960 |
| उत्तराखंड | 963 |
| उत्तर प्रदेश | 912 |
| पश्चिम बंगाल | 950 |
राज्यवार असमानता के प्रमुख कारण
(क) सामाजिक एवं सांस्कृतिक मान्यताएँ
कुछ क्षेत्रों में लंबे समय तक पुत्र को वंश चलाने, धार्मिक अनुष्ठानों और वृद्धावस्था में सहारे से जोड़कर देखा गया। इसके विपरीत, पुत्रियों को आर्थिक दायित्व मानने जैसी सोच ने कई स्थानों पर लड़कियों के जन्म और देखभाल के प्रति भेदभाव को बढ़ावा दिया। ऐसी मान्यताएँ लिंगानुपात को प्रभावित कर सकती हैं, विशेषकर तब जब वे लिंग-चयन या बालिकाओं की उपेक्षा से जुड़ जाएँ।
उदाहरण: हरियाणा और पंजाब में जनगणना 2011 का समग्र लिंगानुपात क्रमशः 879 और 895 था। ये आँकड़े सामाजिक जागरूकता, बालिकाओं की सुरक्षा, शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं के महत्त्व को रेखांकित करते हैं। केवल इन आँकड़ों के आधार पर किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
(ख) स्वास्थ्य, पोषण और मृत्यु-दर
महिलाओं तथा बालिकाओं को पोषण, टीकाकरण और समय पर स्वास्थ्य सेवाएँ मिलने में अंतर होने पर उनकी मृत्यु-दर प्रभावित हो सकती है। मातृ स्वास्थ्य, प्रसव के दौरान देखभाल, शिशु स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा भी दीर्घकाल में समग्र लिंगानुपात को प्रभावित करते हैं।
उदाहरण: केरल का 1,084 का लिंगानुपात लंबे समय से स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक विकास के संदर्भ में चर्चा का विषय रहा है। फिर भी इस उच्च लिंगानुपात को केवल किसी एक स्वास्थ्य या शिक्षा संकेतक का परिणाम नहीं माना जाना चाहिए।
(ग) आर्थिक विकास और महिलाओं की स्थिति
महिलाओं की शिक्षा, रोजगार के अवसर, संपत्ति पर अधिकार और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी लैंगिक समानता को बढ़ावा दे सकते हैं। लेकिन आर्थिक विकास अपने आप बेहतर लिंगानुपात सुनिश्चित नहीं करता। सामाजिक मान्यताएँ, स्वास्थ्य सुविधाएँ और परिवारों की निर्णय प्रक्रिया भी महत्त्वपूर्ण हैं।
उदाहरण: गुजरात और महाराष्ट्र जैसे आर्थिक रूप से विकसित राज्यों में भी जनगणना 2011 का समग्र लिंगानुपात क्रमशः 919 और 929 था। इससे स्पष्ट है कि आर्थिक विकास और लिंगानुपात के बीच संबंध सीधा या एकमात्र कारण पर आधारित नहीं है।
(घ) प्रवास और जनसंख्या की आयु-संरचना
रोजगार की तलाश में पुरुषों का किसी औद्योगिक या महानगरीय क्षेत्र में आना उस क्षेत्र के लिंगानुपात को कम कर सकता है। इसके विपरीत, जिन क्षेत्रों से कामकाजी पुरुष बाहर जाते हैं, वहाँ पुरुषों की तुलना में महिलाओं का अनुपात अधिक हो सकता है।
उदाहरण: निर्माण, परिवहन, विनिर्माण और अन्य श्रम-प्रधान क्षेत्रों में पुरुष प्रवासियों की अधिकता किसी शहर के लिंगानुपात को प्रभावित कर सकती है। यह प्रभाव विशेष रूप से उन शहरों में दिखाई दे सकता है जहाँ बड़ी संख्या में अस्थायी या अकेले रहने वाले पुरुष कामगार आते हैं।
(ङ) लिंग-चयन और बालिकाओं के प्रति भेदभाव
जन्म से पहले लिंग-चयन, बालिकाओं की उपेक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक असमान पहुँच लिंगानुपात के लिए गंभीर चुनौतियाँ हैं। भारत में PCPNDT अधिनियम, 1994, लिंग-चयन पर रोक लगाने और प्रसवपूर्व निदान तकनीकों के नियमन के लिए बनाया गया था।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि समग्र लिंगानुपात केवल जन्म के समय के अनुपात को नहीं दर्शाता; इसमें सभी आयु वर्गों के लोगों की संख्या, मृत्यु-दर और प्रवास का संयुक्त प्रभाव शामिल होता है।
ग्रामीण और नगरीय लिंगानुपात में असमानता
जनगणना 2011 के अनुसार ग्रामीण भारत का लिंगानुपात 949 और नगरीय भारत का 929 था। NFHS-5 (2019–21) में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 1,037 और नगरीय क्षेत्रों के लिए 985 का अनुमान मिला। दोनों स्रोतों में ग्रामीण लिंगानुपात अधिक दिखाई देता है, हालाँकि उनके आँकड़ों के स्तर अलग हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में लिंगानुपात अधिक होने के कारण
ग्रामीण क्षेत्रों से पुरुषों का शहरों की ओर रोजगार के लिए जाना एक महत्त्वपूर्ण कारण हो सकता है। जब कामकाजी पुरुष कुछ समय या लंबे समय के लिए गाँव छोड़ते हैं, तो गाँव में रहने वाली जनसंख्या में महिलाओं का अनुपात बढ़ सकता है। इसके अतिरिक्त ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों की आयु-संरचना, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच तथा परिवारों की संरचना में अंतर भी लिंगानुपात को प्रभावित कर सकते हैं।
उदाहरण: यदि किसी गाँव से बड़ी संख्या में पुरुष दिल्ली, गुरुग्राम, मुंबई या सूरत जैसे शहरों में रोजगार के लिए जाते हैं और उनके परिवार गाँव में रहते हैं, तो गाँव की स्थायी आबादी में महिलाओं का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक दिखाई दे सकता है। यह एक उदाहरण है; प्रत्येक ग्रामीण क्षेत्र में ऐसा ही हो, यह आवश्यक नहीं है।
नगरीय क्षेत्रों में लिंगानुपात कम होने के कारण
शहरों में उद्योग, निर्माण, परिवहन, सुरक्षा और अन्य कार्यों के लिए पुरुष कामगारों का प्रवास कुछ स्थानों पर पुरुषों की संख्या बढ़ा सकता है। छात्रावासों, श्रमिक बस्तियों और ऐसे आवासीय क्षेत्रों में जहाँ पुरुष अकेले रहते हैं, यह प्रभाव अधिक हो सकता है।
उदाहरण: किसी औद्योगिक नगर में यदि बड़ी संख्या में पुरुष श्रमिक दूसरे राज्यों से आते हैं और उनके परिवार अपने मूल गाँव में रहते हैं, तो उस नगर का समग्र लिंगानुपात कम हो सकता है। दूसरी ओर, सभी शहरों में पुरुषों का अनुपात अधिक नहीं होता; महिलाओं के रोजगार, शिक्षा, विवाह और प्रवास के कारण कई नगरीय क्षेत्रों में स्थिति अलग हो सकती है।
क्या ग्रामीण क्षेत्रों का अधिक लिंगानुपात हमेशा बेहतर स्थिति दर्शाता है?
नहीं। ग्रामीण-नगरीय अंतर को केवल सामाजिक समानता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। किसी क्षेत्र में महिलाओं का अनुपात अधिक होने के पीछे पुरुषों का बाहरी प्रवास, महिलाओं की अधिक जीवन प्रत्याशा या आयु-संरचना जैसे कारण हो सकते हैं। इसलिए लिंगानुपात की व्याख्या करते समय बाल लिंगानुपात, जन्म के समय लिंगानुपात, महिला साक्षरता, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे अन्य संकेतकों को भी देखना चाहिए।
लिंगानुपात का भौगोलिक महत्त्व
लिंगानुपात जनसंख्या भूगोल में क्षेत्रीय असमानता, प्रवास, सामाजिक विकास और जनसांख्यिकीय परिवर्तन को समझने में सहायता करता है। राज्यवार तुलना से पता चलता है कि एक ही देश के भीतर अलग-अलग क्षेत्रों की जनसंख्या संरचना कितनी भिन्न हो सकती है। ग्रामीण-नगरीय तुलना से यह समझने में मदद मिलती है कि रोजगार के अवसर और प्रवास जनसंख्या की संरचना को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।
FAQs
1. भारत में लिंगानुपात की गणना कैसे की जाती है?
महिलाओं की कुल संख्या को पुरुषों की कुल संख्या से विभाजित करके 1,000 से गुणा किया जाता है।
2. जनगणना 2011 के अनुसार किस राज्य का लिंगानुपात सबसे अधिक था?
केरल का लिंगानुपात 1,084 महिलाएँ प्रति 1,000 पुरुष था।
3. ग्रामीण भारत में लिंगानुपात नगरीय भारत से अधिक क्यों हो सकता है?
पुरुषों का रोजगार के लिए शहरों की ओर प्रवास, आयु-संरचना और क्षेत्रीय सामाजिक-स्वास्थ्य परिस्थितियाँ इसके संभावित कारण हैं। हालाँकि, प्रत्येक क्षेत्र के लिए अलग-अलग कारणों की जाँच आवश्यक है।