जल विद्युत शक्ति भारत के ऊर्जा संसाधनों का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। नदियों के बहाव, ऊँचाई से गिरते जल और बाँधों में संचित पानी की ऊर्जा का उपयोग करके बिजली उत्पन्न की जाती है। जल विद्युत को नवीकरणीय ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। यह बिजली उत्पादन के साथ-साथ सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, जल भंडारण और बिजली की अधिक माँग के समय ग्रिड को सहायता देने में भी उपयोगी है।
भारत में हिमालयी नदियों, उत्तर-पूर्वी भारत की तीव्र ढाल वाली नदियों तथा पश्चिमी घाट की नदियों में जल विद्युत विकास की उल्लेखनीय संभावनाएँ हैं। हालांकि, देश के सभी क्षेत्रों में इसकी क्षमता और विकास समान नहीं है।
जल विद्युत शक्ति क्या है?
जल विद्युत शक्ति वह बिजली है जो बहते या ऊँचाई से गिरते पानी की गतिज अथवा स्थितिज ऊर्जा को टरबाइन और जनरेटर की सहायता से विद्युत ऊर्जा में बदलकर उत्पन्न की जाती है।
सामान्य जल विद्युत परियोजना में बाँध या जलाशय, जल प्रवाह के लिए पेनस्टॉक (Penstock), टरबाइन, जनरेटर और विद्युत वितरण व्यवस्था प्रमुख भाग होते हैं। पानी के दबाव से टरबाइन घूमती है और जनरेटर बिजली उत्पन्न करता है।

जल विद्युत परियोजनाओं के प्रमुख प्रकार हैं:
- बाँध आधारित परियोजना (Storage Hydropower): बाँध में पानी संचित करके आवश्यकता के अनुसार बिजली बनाई जाती है।
- नदी प्रवाह आधारित परियोजना (Run-of-the-River): नदी के प्राकृतिक प्रवाह का उपयोग करके बिजली उत्पन्न की जाती है; इनमें बड़े जलाशय की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
- लघु जल विद्युत (Small Hydro): भारत में 25 मेगावाट तक की क्षमता वाली परियोजनाएँ लघु जल विद्युत की श्रेणी में आती हैं।
- पम्प्ड स्टोरेज परियोजना (Pumped Storage Project): कम माँग के समय पानी को ऊँचे जलाशय में पम्प किया जाता है और बिजली की अधिक माँग के समय नीचे छोड़कर बिजली उत्पन्न की जाती है। यह ऊर्जा भंडारण का भी एक साधन है।
भारत में जल विद्युत का ऐतिहासिक विकास
भारत में जल विद्युत का विकास औपनिवेशिक काल के अंतिम चरण में शुरू हुआ। शुरुआती परियोजनाओं का उद्देश्य पहाड़ी नगरों, औद्योगिक गतिविधियों और खनन क्षेत्रों को बिजली उपलब्ध कराना था।
भारत के पहले और दूसरे जल विद्युत केंद्र
| क्रम | जल विद्युत केंद्र | वर्ष | स्थान एवं महत्त्व |
| पहला प्रमुख ऐतिहासिक जल विद्युत केंद्र | सिद्रापोंग (Sidrapong) जल विद्युत केंद्र | 1897 | दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल। इसकी प्रारंभिक क्षमता लगभग 130 किलोवाट थी। इसे भारत के शुरुआती जल विद्युत केंद्रों में सबसे पहले स्थापित केंद्र के रूप में माना जाता है। |
| दूसरा महत्त्वपूर्ण केंद्र | शिवनासमुद्रम (Shivanasamudram) | 1902 | कावेरी नदी, कर्नाटक। इसे कोलार स्वर्ण खदानों को बिजली देने के लिए विकसित किया गया था। यह एशिया की शुरुआती बड़े पैमाने की जल विद्युत परियोजनाओं में शामिल था। |
स्वतंत्रता से पहले का विकास
बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में दक्षिण भारत, पश्चिमी भारत और हिमालयी क्षेत्रों में जल विद्युत परियोजनाओं का विकास हुआ। शिवनासमुद्रम, पायकारा, मेट्टूर, पापनासम और जोगिंदरनगर जैसी परियोजनाएँ इस विकास के प्रमुख उदाहरण हैं। इन परियोजनाओं ने खनन, उद्योग, नगरों और क्षेत्रीय बिजली आपूर्ति को बढ़ावा दिया।
स्वतंत्रता के बाद का विकास
स्वतंत्रता के बाद बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के माध्यम से जल विद्युत विकास को गति मिली। भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड, रिहंद, कोसी, गंडक, चंबल, कोयना और नर्मदा घाटी से जुड़ी परियोजनाओं ने बिजली उत्पादन के साथ सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और जल प्रबंधन में भी योगदान दिया।
समय के साथ हिमालयी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं का विकास हुआ। टिहरी, नाथपा झाकड़ी, सलाल, बगलिहार, दुलहस्ती और तीस्ता क्षेत्र की परियोजनाएँ आधुनिक जल विद्युत विकास के उदाहरण हैं।
भारत में जल विद्युत की कुल संभावित क्षमता
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के 2017–2023 के पुनर्मूल्यांकन के अनुसार, भारत में 25 मेगावाट से अधिक क्षमता वाली बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं की व्यावहारिक रूप से दोहन योग्य संभावित क्षमता 1,33,410 मेगावाट (133.41 GW) आंकी गई है। इसके अतिरिक्त, पम्प्ड स्टोरेज परियोजनाओं की पहचानी गई संभावित क्षमता 1,76,280 मेगावाट (176.28 GW) है। पम्प्ड स्टोरेज की क्षमता को पारंपरिक जल विद्युत क्षमता से अलग समझना चाहिए।
जल विद्युत क्षमता के विकास में तीन बातें अलग-अलग समझना आवश्यक है:
1. संभावित क्षमता: किसी क्षेत्र में विकसित की जा सकने वाली अनुमानित क्षमता।
2. संचालित क्षमता: जिन परियोजनाओं से वर्तमान में बिजली उत्पन्न की जा रही है।
3. निर्माणाधीन क्षमता: जिन परियोजनाओं का निर्माण चल रहा है।
इन तीनों आँकड़ों को एक ही मान लेना सही नहीं है।
राज्यवार जल विद्युत संभाव्यता और विकास
भारत में जल विद्युत क्षमता का वितरण अत्यंत असमान है। अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और सिक्किम जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में नदियों की ढाल, जल प्रवाह और घाटियों की बनावट के कारण बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। इसके विपरीत, हरियाणा जैसे राज्यों में बड़ी पारंपरिक जल विद्युत परियोजनाओं की पहचानी गई क्षमता बहुत कम या शून्य है।
नीचे दी गई तालिका में राज्यवार संभावित क्षमता के लिए CEA का 30 जून 2024 तक उपलब्ध विवरण और विकास की स्थिति समझने के लिए CEA के दिसंबर 2023 के आधिकारिक विवरण का उपयोग किया गया है।

प्रमुख राज्यों में जल विद्युत क्षमता और विकास
| राज्य/केंद्रशासित प्रदेश | बड़ी जल विद्युत की संभावित क्षमता (MW) | संचालित क्षमता (MW)* |
| अरुणाचल प्रदेश | 50,394 | 1,115 |
| हिमाचल प्रदेश | 18,305 | 10,263 |
| उत्तराखंड | 13,481 | 3,975 |
| जम्मू-कश्मीर | 12,264 | 3,360 |
| सिक्किम | 6,051 | 2,282 |
| कर्नाटक | 4,414 | 3,689 |
| महाराष्ट्र | 3,144 | 2,647 |
| ओडिशा | 2,825 | 2,155 |
| मध्य प्रदेश | 2,819 | 2,235 |
| आंध्र प्रदेश | 2,596 | 1,610 |
| केरल | 2,473 | 1,864 |
| मेघालय | 2,026 | 322 |
| मिजोरम | 1,927 | 60 |
| तमिलनाडु | 1,785 | 1,778 |
| तेलंगाना | 1,302 | 800 |
| छत्तीसगढ़ | 1,311 | 120 |
| पंजाब | 1,301 | 1,096 |
| असम | 643 | 350 |
| मणिपुर | 615 | 105 |
| गुजरात | 550 | 550 |
| उत्तर प्रदेश | 502 | 502 |
| राजस्थान | 411 | 411 |
| नागालैंड | 325 | 75 |
| झारखंड | 300 | 210 |
| बिहार | 130 | 0 |
| लद्दाख | 707 | 89 |
| पश्चिम बंगाल | 809 | 441 |
राज्यवार वितरण से प्रमुख निष्कर्ष
- अरुणाचल प्रदेश में भारत की सबसे अधिक पहचानी गई बड़ी जल विद्युत संभाव्यता है—50,394 MW। इसके बावजूद इसकी संचालित क्षमता संभावित क्षमता की तुलना में कम है, इसलिए यहाँ विकास की बड़ी गुंजाइश बनी हुई है।
- हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पर्वतीय ढाल, हिमनदों से पोषित नदियाँ और गहरी घाटियाँ जल विद्युत विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उपलब्ध कराती हैं।
- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में सिंधु नदी तंत्र की नदियाँ जल विद्युत विकास के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
- सिक्किम में तीस्ता नदी तंत्र के कारण उल्लेखनीय जल विद्युत क्षमता है।
- कर्नाटक, महाराष्ट्र, केरल और तमिलनाडु में पश्चिमी घाट और प्रायद्वीपीय नदियों के कारण जल विद्युत परियोजनाएँ विकसित हुई हैं।
- मध्य प्रदेश और गुजरात में नर्मदा तथा माही नदी तंत्र से जुड़ी परियोजनाएँ महत्त्वपूर्ण हैं।
- पंजाब में भाखड़ा और ब्यास तंत्र से जुड़ी परियोजनाएँ उपयोगी हैं; वहीं हरियाणा में बड़ी पारंपरिक जल विद्युत क्षमता का अभाव है।
नदी-बेसिन के अनुसार जल विद्युत क्षमता का विकास
जल विद्युत की संभावनाओं का आकलन केवल राज्य की सीमा से नहीं, बल्कि नदी-बेसिन के आधार पर भी किया जाता है। एक नदी-बेसिन में कई राज्य शामिल हो सकते हैं। इसलिए राज्यवार क्षमता और बेसिनवार क्षमता को अलग-अलग पढ़ना चाहिए।
नीचे की सारणी में CEA की Growth Book 2025 में 31 मार्च 2025 तक 25 MW से अधिक क्षमता वाली परियोजनाओं के लिए बेसिनवार विकास की स्थिति दी गई है।
| नदी-बेसिन | संचालित/विकसित क्षमता (%) | निर्माणाधीन (%) | विकसित + निर्माणाधीन (%) | शेष संभावित क्षमता (%) |
| सिंधु बेसिन | 47.51 | 15.48 | 62.99 | 37.01 |
| गंगा बेसिन | 36.86 | 8.11 | 44.91 | 55.09 |
| मध्य भारतीय नदी तंत्र | 70.24 | 0 | 70.24 | 29.76 |
| पश्चिम की ओर बहने वाली प्रायद्वीपीय नदियाँ | 82.61 | 0.57 | 83.18 | 16.82 |
| पूर्व की ओर बहने वाली प्रायद्वीपीय नदियाँ | 73.2 | 10.56 | 83.76 | 16.24 |
| ब्रह्मपुत्र बेसिन | 7.47 | 9.15 | 16.62 | 83.38 |
| भारत का कुल | 32.22 | 9.92 | 41.54 | 58.46 |
नोट: पश्चिम की ओर बहने वाली प्रायद्वीपीय नदियों और पूर्व की ओर बहने वाली प्रायद्वीपीय नदियों की पहचानी गई क्षमता का बड़ा हिस्सा विकसित हो चुका है या निर्माणाधीन है। इसके विपरीत, ब्रह्मपुत्र बेसिन में 83.38% क्षमता शेष होने का अर्थ है कि इस बेसिन में विकास की बड़ी संभावनाएँ हैं। लेकिन दुर्गम भूभाग, भूकंपीय सक्रियता, पारिस्थितिक संवेदनशीलता और परियोजना लागत इसके विकास को चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।
भारत की प्रमुख जल विद्युत परियोजनाएँ
| उत्तर भारत एवं हिमालयी क्षेत्र | ||||
| क्र. | जल विद्युत परियोजना | नदी | राज्य/केंद्रशासित प्रदेश | स्थापित क्षमता (लगभग) |
| 1 | भाखड़ा | सतलुज | हिमाचल प्रदेश–पंजाब | 1,325 MW |
| 2 | नाथपा झाकड़ी | सतलुज | हिमाचल प्रदेश | 1,500 MW |
| 3 | रामपुर | सतलुज | हिमाचल प्रदेश | 412 MW |
| 4 | पोंग बाँध | ब्यास | हिमाचल प्रदेश | 396 MW |
| 5 | पंडोह–देहर जल विद्युत प्रणाली | ब्यास | हिमाचल प्रदेश | देहर: 990 MW |
| 6 | चमेरा-I | रावी | हिमाचल प्रदेश | 540 MW |
| 7 | चमेरा-II | रावी | हिमाचल प्रदेश | 300 MW |
| 8 | बaira सिउल | बुढ़िल | हिमाचल प्रदेश | 180 MW |
| 9 | टिहरी | भागीरथी | उत्तराखंड | 1,000 MW |
| 10 | कोटेश्वर | भागीरथी | उत्तराखंड | 400 MW |
| 11 | मनेरी भाली-I | भागीरथी | उत्तराखंड | 90 MW |
| 12 | मनेरी भाली-II | भागीरथी | उत्तराखंड | 304 MW |
| 13 | धौलीगंगा | धौलीगंगा | उत्तराखंड | 280 MW |
| 14 | टनकपुर | शारदा/काली | उत्तराखंड | 120 MW |
| 15 | रामगंगा | रामगंगा | उत्तराखंड | 198 MW |
| 16 | सलाल | चिनाब | जम्मू-कश्मीर | 690 MW |
| 17 | दुलहस्ती | चिनाब | जम्मू-कश्मीर | 390 MW |
| 18 | बगलिहार-I एवं II | चिनाब | जम्मू-कश्मीर | 900 MW |
| 19 | रतले | चिनाब | जम्मू-कश्मीर | 850 MW |
| 20 | उरी-I | झेलम | जम्मू-कश्मीर | 480 MW |
| 21 | उरी-II | झेलम | जम्मू-कश्मीर | 240 MW |
| 22 | किशनगंगा | किशनगंगा/नीलम | जम्मू-कश्मीर | 330 MW |
| 23 | पाकल दुल | मरुसुदर | जम्मू-कश्मीर | 1,000 MW |
| 24 | निमू-बाजगो | सिंधु | लद्दाख | 45 MW |
| प्रायद्वीपीय भारत की प्रमुख परियोजनाएँ | ||||
| क्र. | जल विद्युत परियोजना | नदी | राज्य | स्थापित क्षमता (लगभग) |
| 25 | शिवनासमुद्रम | कावेरी | कर्नाटक | ऐतिहासिक केंद्र |
| 26 | शरावती | शरावती | कर्नाटक | 1,035 MW |
| 27 | महात्मा गांधी/जोग जल विद्युत केंद्र | शरावती | कर्नाटक | ऐतिहासिक केंद्र |
| 28 | काली नदी परियोजना | काली | कर्नाटक | 1,200 MW से अधिक, विभिन्न परियोजनाएँ |
| 29 | कृष्णराज सागर से संबद्ध जल विद्युत केंद्र | कावेरी | कर्नाटक | ऐतिहासिक महत्त्व |
| 30 | अलमट्टी | कृष्णा | कर्नाटक | लगभग 290 MW |
| 31 | नागार्जुन सागर | कृष्णा | तेलंगाना–आंध्र प्रदेश | 816 MW |
| 32 | श्रीशैलम | कृष्णा | तेलंगाना–आंध्र प्रदेश | लगभग 1,670 MW |
| 33 | लोअर सिलेरू | सिलेरू | आंध्र प्रदेश | लगभग 460 MW |
| 34 | मचकुंड | मचकुंड | आंध्र प्रदेश–ओडिशा क्षेत्र | लगभग 120 MW |
| 35 | इंदिरा सागर | नर्मदा | मध्य प्रदेश | 1,000 MW |
| 36 | ओंकारेश्वर | नर्मदा | मध्य प्रदेश | 520 MW |
| 37 | गांधी सागर | चंबल | मध्य प्रदेश | 115 MW |
| 38 | बाणसागर | सोन | मध्य प्रदेश | लगभग 425 MW |
| 39 | सरदार सरोवर | नर्मदा | गुजरात | 1,450 MW |
| 40 | उकाई | तापी | गुजरात | 300 MW |
| 41 | कड़ाना | माही | गुजरात | 240 MW के आसपास |
| 42 | कोयना | कोयना | महाराष्ट्र | लगभग 1,960 MW |
| 43 | भिरा | कुंडलिका/पश्चिमी घाट का जल तंत्र | महाराष्ट्र | लगभग 300 MW |
| 44 | वैतरणा | वैतरणा | महाराष्ट्र | लगभग 60 MW |
| 45 | इडुक्की | पेरियार | केरल | 780 MW |
| 46 | सबरीगिरि | पंबा–कक्की नदी तंत्र | केरल | 340 MW के आसपास |
| 47 | पल्लिवासल | मुदिरापुझा | केरल | लगभग 37 MW |
| 48 | पायकारा | पायकारा | तमिलनाडु | लगभग 150 MW |
| 49 | कुंडाह | कुंडाह नदी तंत्र | तमिलनाडु | लगभग 500 MW |
| 50 | मेट्टूर | कावेरी | तमिलनाडु | लगभग 200 MW |
| 51 | पापनासम | तामिरापरणी | तमिलनाडु | लगभग 28 MW |
| पूर्वी भारत एवं उत्तर-पूर्वी भारत | ||||
| क्र. | जल विद्युत परियोजना | नदी | राज्य | स्थापित क्षमता (लगभग) |
| 52 | हीराकुंड | महानदी | ओडिशा | लगभग 347 MW |
| 53 | बालिमेला | सिलेरू | ओडिशा | 510 MW |
| 54 | रेंगाली | ब्राह्मणी | ओडिशा | लगभग 250 MW |
| 55 | तिलैया | बराकर | झारखंड | लगभग 4 MW |
| 56 | पंचेत | दामोदर | झारखंड–पश्चिम बंगाल क्षेत्र | लगभग 40 MW |
| 57 | मैथन | बराकर | झारखंड–पश्चिम बंगाल क्षेत्र | लगभग 60 MW |
| 58 | तीस्ता-V | तीस्ता | सिक्किम | 510 MW |
| 59 | रंगित | रंगित | सिक्किम | 60 MW |
| 60 | लोकटक | लोकटक झील/इंफाल नदी तंत्र | मणिपुर | 105 MW |
| 61 | उमियम | उमियम | मेघालय | लगभग 185 MW, चरणों सहित |
| 62 | दोयांग | दोयांग | नागालैंड | 75 MW |
| 63 | रंगानदी | रंगानदी | अरुणाचल प्रदेश | 405 MW |
| 64 | कामेंग | कामेंग | अरुणाचल प्रदेश | 600 MW |
| 65 | सुबनसिरी लोअर | सुबनसिरी | अरुणाचल प्रदेश–असम | 2,000 MW |
| 66 | दिबांग बहुउद्देशीय परियोजना | दिबांग | अरुणाचल प्रदेश | 2,880 MW; निर्माणाधीन |
| 67 | तीस्ता-VI | तीस्ता | सिक्किम | 500 MW; निर्माणाधीन |
| 68 | पकल दुल | मरुसुदर | जम्मू-कश्मीर | 1,000 MW; निर्माणाधीन |
| 69 | किरू | चिनाब | जम्मू-कश्मीर | 624 MW; निर्माणाधीन |
| 70 | क्वार | चिनाब | जम्मू-कश्मीर | 540 MW; निर्माणाधीन |
भारत की वर्तमान जल विद्युत स्थापित क्षमता
विद्युत मंत्रालय द्वारा लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, 31 जनवरी 2026 को भारत की बड़ी जल विद्युत स्थापित क्षमता 51,165 MW थी। देश की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 5,20,511 MW थी। इस आधार पर बड़ी जल विद्युत क्षमता का हिस्सा कुल स्थापित क्षमता का लगभग 9.8% था। लघु जल विद्युत को सरकारी आँकड़ों में अलग श्रेणी में भी दिखाया जाता है।
| संकेतक | क्षमता |
| भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता | 5,20,511 MW |
| बड़ी जल विद्युत स्थापित क्षमता | 51,165 MW |
| बड़ी जल विद्युत का कुल स्थापित क्षमता में हिस्सा | लगभग 9.8% |
| लघु जल विद्युत की स्थापित क्षमता | लगभग 5,159 MW |
भारत में जल विद्युत का महत्त्व
1. नवीकरणीय बिजली: पानी के प्रवाह से बिजली उत्पन्न होती है और सामान्य संचालन के दौरान कोयला आधारित संयंत्रों की तरह ईंधन जलाने की आवश्यकता नहीं होती।
2. पीक-लोड आपूर्ति: जलाशय आधारित परियोजनाएँ बिजली की माँग बढ़ने पर उत्पादन बढ़ाने में मदद कर सकती हैं।
3. ग्रिड संतुलन: सौर और पवन ऊर्जा के उत्पादन में उतार-चढ़ाव होने पर जल विद्युत प्रणाली को संतुलित करने में सहायक हो सकती है।
4. सिंचाई और जल प्रबंधन: बहुउद्देशीय बाँध बिजली के अतिरिक्त सिंचाई, पेयजल और बाढ़ प्रबंधन में भूमिका निभा सकते हैं।
5. क्षेत्रीय विकास: दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क, संचार और अन्य आधारभूत सुविधाओं के विकास को बढ़ावा मिल सकता है।
जल विद्युत विकास की प्रमुख चुनौतियाँ
- पर्यावरणीय प्रभाव: बाँधों और जलाशयों से वन, जैव विविधता, नदी के प्राकृतिक प्रवाह और स्थानीय पारिस्थितिकी पर असर पड़ सकता है।
- विस्थापन: बड़े जलाशयों के कारण गाँवों, कृषि भूमि और स्थानीय समुदायों का पुनर्वास आवश्यक हो सकता है।
- भूगर्भीय जोखिम: हिमालय जैसे भूकंपीय रूप से सक्रिय क्षेत्रों में भूस्खलन, भूकंप और चट्टानों की अस्थिरता परियोजनाओं को प्रभावित कर सकती है।
- नदी के प्रवाह में परिवर्तन: जल प्रवाह में बदलाव से नीचे की ओर स्थित पारिस्थितिकी, मत्स्य संसाधन और नदी पर निर्भर समुदाय प्रभावित हो सकते हैं।
- जलवायु परिवर्तन: वर्षा की अनिश्चितता, हिमनदों में परिवर्तन, सूखा और अचानक बाढ़ बिजली उत्पादन की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकते हैं।
- उच्च लागत और लंबा निर्माण काल: सुरंगों, बाँधों, सड़कों और कठिन भूभाग में निर्माण के कारण परियोजनाएँ महँगी तथा समय लेने वाली हो सकती हैं।
इसलिए जल विद्युत परियोजनाओं की योजना बनाते समय बिजली की आवश्यकता के साथ पर्यावरणीय प्रवाह, भूस्खलन जोखिम, स्थानीय समुदायों के अधिकार और नदी-बेसिन के समग्र प्रबंधन को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
FAQs
प्रश्न 1. भारत का पहला जल विद्युत केंद्र कहाँ स्थापित किया गया था?
उत्तर: सिद्रापोंग जल विद्युत केंद्र 1897 में दार्जिलिंग में स्थापित किया गया था। इसकी प्रारंभिक क्षमता लगभग 130 किलोवाट थी।
प्रश्न 2. भारत में जल विद्युत की सर्वाधिक संभावित क्षमता किस राज्य में है?
उत्तर: CEA के 2017–2023 पुनर्मूल्यांकन के राज्यवार विवरण में अरुणाचल प्रदेश की संभावित बड़ी जल विद्युत क्षमता 50,394 MW है, जो राज्यों में सर्वाधिक है।
प्रश्न 3. जल विद्युत और पम्प्ड स्टोरेज परियोजना में क्या अंतर है?
उत्तर: सामान्य जल विद्युत परियोजना पानी की ऊर्जा से बिजली बनाती है। पम्प्ड स्टोरेज परियोजना कम माँग के समय पानी को ऊँचाई पर पम्प करके संग्रहित करती है और माँग बढ़ने पर उसी पानी से बिजली बनाकर ऊर्जा भंडारण में सहायता करती है।
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