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भारत में जल विद्युत शक्ति (Hydroelectric Power): ऐतिहासिक विकास, राज्यवार क्षमता और प्रमुख परियोजनाएँ

जल विद्युत शक्ति भारत के ऊर्जा संसाधनों का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। नदियों के बहाव, ऊँचाई से गिरते जल और बाँधों में संचित पानी की ऊर्जा का उपयोग करके बिजली उत्पन्न की जाती है। जल विद्युत को नवीकरणीय ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। यह बिजली उत्पादन के साथ-साथ सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, जल भंडारण और बिजली की अधिक माँग के समय ग्रिड को सहायता देने में भी उपयोगी है।

भारत में हिमालयी नदियों, उत्तर-पूर्वी भारत की तीव्र ढाल वाली नदियों तथा पश्चिमी घाट की नदियों में जल विद्युत विकास की उल्लेखनीय संभावनाएँ हैं। हालांकि, देश के सभी क्षेत्रों में इसकी क्षमता और विकास समान नहीं है।

जल विद्युत शक्ति क्या है?

जल विद्युत शक्ति वह बिजली है जो बहते या ऊँचाई से गिरते पानी की गतिज अथवा स्थितिज ऊर्जा को टरबाइन और जनरेटर की सहायता से विद्युत ऊर्जा में बदलकर उत्पन्न की जाती है।

सामान्य जल विद्युत परियोजना में बाँध या जलाशय, जल प्रवाह के लिए पेनस्टॉक (Penstock), टरबाइन, जनरेटर और विद्युत वितरण व्यवस्था प्रमुख भाग होते हैं। पानी के दबाव से टरबाइन घूमती है और जनरेटर बिजली उत्पन्न करता है।

Hydroelectric Power Generation Infographic

जल विद्युत परियोजनाओं के प्रमुख प्रकार हैं:

  • बाँध आधारित परियोजना (Storage Hydropower): बाँध में पानी संचित करके आवश्यकता के अनुसार बिजली बनाई जाती है।
  • नदी प्रवाह आधारित परियोजना (Run-of-the-River): नदी के प्राकृतिक प्रवाह का उपयोग करके बिजली उत्पन्न की जाती है; इनमें बड़े जलाशय की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
  • लघु जल विद्युत (Small Hydro): भारत में 25 मेगावाट तक की क्षमता वाली परियोजनाएँ लघु जल विद्युत की श्रेणी में आती हैं।
  • पम्प्ड स्टोरेज परियोजना (Pumped Storage Project): कम माँग के समय पानी को ऊँचे जलाशय में पम्प किया जाता है और बिजली की अधिक माँग के समय नीचे छोड़कर बिजली उत्पन्न की जाती है। यह ऊर्जा भंडारण का भी एक साधन है।

भारत में जल विद्युत का ऐतिहासिक विकास

भारत में जल विद्युत का विकास औपनिवेशिक काल के अंतिम चरण में शुरू हुआ। शुरुआती परियोजनाओं का उद्देश्य पहाड़ी नगरों, औद्योगिक गतिविधियों और खनन क्षेत्रों को बिजली उपलब्ध कराना था।

 भारत के पहले और दूसरे जल विद्युत केंद्र

क्रमजल विद्युत केंद्रवर्षस्थान एवं महत्त्व
पहला प्रमुख ऐतिहासिक जल विद्युत केंद्रसिद्रापोंग (Sidrapong) जल विद्युत केंद्र1897दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल। इसकी प्रारंभिक क्षमता लगभग 130 किलोवाट थी। इसे भारत के शुरुआती जल विद्युत केंद्रों में सबसे पहले स्थापित केंद्र के रूप में माना जाता है।
दूसरा महत्त्वपूर्ण केंद्रशिवनासमुद्रम (Shivanasamudram)1902कावेरी नदी, कर्नाटक। इसे कोलार स्वर्ण खदानों को बिजली देने के लिए विकसित किया गया था। यह एशिया की शुरुआती बड़े पैमाने की जल विद्युत परियोजनाओं में शामिल था।

स्वतंत्रता से पहले का विकास

बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में दक्षिण भारत, पश्चिमी भारत और हिमालयी क्षेत्रों में जल विद्युत परियोजनाओं का विकास हुआ। शिवनासमुद्रम, पायकारा, मेट्टूर, पापनासम और जोगिंदरनगर जैसी परियोजनाएँ इस विकास के प्रमुख उदाहरण हैं। इन परियोजनाओं ने खनन, उद्योग, नगरों और क्षेत्रीय बिजली आपूर्ति को बढ़ावा दिया।

 स्वतंत्रता के बाद का विकास

स्वतंत्रता के बाद बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के माध्यम से जल विद्युत विकास को गति मिली। भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड, रिहंद, कोसी, गंडक, चंबल, कोयना और नर्मदा घाटी से जुड़ी परियोजनाओं ने बिजली उत्पादन के साथ सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और जल प्रबंधन में भी योगदान दिया।

समय के साथ हिमालयी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं का विकास हुआ। टिहरी, नाथपा झाकड़ी, सलाल, बगलिहार, दुलहस्ती और तीस्ता क्षेत्र की परियोजनाएँ आधुनिक जल विद्युत विकास के उदाहरण हैं।

भारत में जल विद्युत की कुल संभावित क्षमता

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के 2017–2023 के पुनर्मूल्यांकन के अनुसार, भारत में 25 मेगावाट से अधिक क्षमता वाली बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं की व्यावहारिक रूप से दोहन योग्य संभावित क्षमता 1,33,410 मेगावाट (133.41 GW) आंकी गई है। इसके अतिरिक्त, पम्प्ड स्टोरेज परियोजनाओं की पहचानी गई संभावित क्षमता 1,76,280 मेगावाट (176.28 GW) है। पम्प्ड स्टोरेज की क्षमता को पारंपरिक जल विद्युत क्षमता से अलग समझना चाहिए।

जल विद्युत क्षमता के विकास में तीन बातें अलग-अलग समझना आवश्यक है:

1. संभावित क्षमता: किसी क्षेत्र में विकसित की जा सकने वाली अनुमानित क्षमता।

2. संचालित क्षमता: जिन परियोजनाओं से वर्तमान में बिजली उत्पन्न की जा रही है।

3. निर्माणाधीन क्षमता: जिन परियोजनाओं का निर्माण चल रहा है।

इन तीनों आँकड़ों को एक ही मान लेना सही नहीं है।

राज्यवार जल विद्युत संभाव्यता और विकास

भारत में जल विद्युत क्षमता का वितरण अत्यंत असमान है। अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और सिक्किम जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में नदियों की ढाल, जल प्रवाह और घाटियों की बनावट के कारण बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। इसके विपरीत, हरियाणा जैसे राज्यों में बड़ी पारंपरिक जल विद्युत परियोजनाओं की पहचानी गई क्षमता बहुत कम या शून्य है।

नीचे दी गई तालिका में राज्यवार संभावित क्षमता के लिए CEA का 30 जून 2024 तक उपलब्ध विवरण और विकास की स्थिति समझने के लिए CEA के दिसंबर 2023 के आधिकारिक विवरण का उपयोग किया गया है।

भारत की जल विद्युत क्षमता और विकास

प्रमुख राज्यों में जल विद्युत क्षमता और विकास

राज्य/केंद्रशासित प्रदेशबड़ी जल विद्युत की संभावित क्षमता (MW)संचालित क्षमता (MW)*
अरुणाचल प्रदेश50,3941,115
हिमाचल प्रदेश18,30510,263
उत्तराखंड13,4813,975
जम्मू-कश्मीर12,2643,360
सिक्किम6,0512,282
कर्नाटक4,4143,689
महाराष्ट्र3,1442,647
ओडिशा2,8252,155
मध्य प्रदेश2,8192,235
आंध्र प्रदेश2,5961,610
केरल2,4731,864
मेघालय2,026322
मिजोरम1,92760
तमिलनाडु1,7851,778
तेलंगाना1,302800
छत्तीसगढ़1,311120
पंजाब1,3011,096
असम643350
मणिपुर615105
गुजरात550550
उत्तर प्रदेश502502
राजस्थान411411
नागालैंड32575
झारखंड300210
बिहार1300
लद्दाख70789
पश्चिम बंगाल809441

 राज्यवार वितरण से प्रमुख निष्कर्ष

  • अरुणाचल प्रदेश में भारत की सबसे अधिक पहचानी गई बड़ी जल विद्युत संभाव्यता है—50,394 MW। इसके बावजूद इसकी संचालित क्षमता संभावित क्षमता की तुलना में कम है, इसलिए यहाँ विकास की बड़ी गुंजाइश बनी हुई है।
  • हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पर्वतीय ढाल, हिमनदों से पोषित नदियाँ और गहरी घाटियाँ जल विद्युत विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उपलब्ध कराती हैं।
  • जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में सिंधु नदी तंत्र की नदियाँ जल विद्युत विकास के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
  • सिक्किम में तीस्ता नदी तंत्र के कारण उल्लेखनीय जल विद्युत क्षमता है।
  • कर्नाटक, महाराष्ट्र, केरल और तमिलनाडु में पश्चिमी घाट और प्रायद्वीपीय नदियों के कारण जल विद्युत परियोजनाएँ विकसित हुई हैं।
  • मध्य प्रदेश और गुजरात में नर्मदा तथा माही नदी तंत्र से जुड़ी परियोजनाएँ महत्त्वपूर्ण हैं।
  • पंजाब में भाखड़ा और ब्यास तंत्र से जुड़ी परियोजनाएँ उपयोगी हैं; वहीं हरियाणा में बड़ी पारंपरिक जल विद्युत क्षमता का अभाव है।

 नदी-बेसिन के अनुसार जल विद्युत क्षमता का विकास

जल विद्युत की संभावनाओं का आकलन केवल राज्य की सीमा से नहीं, बल्कि नदी-बेसिन के आधार पर भी किया जाता है। एक नदी-बेसिन में कई राज्य शामिल हो सकते हैं। इसलिए राज्यवार क्षमता और बेसिनवार क्षमता को अलग-अलग पढ़ना चाहिए।

नीचे की सारणी में CEA की Growth Book 2025 में 31 मार्च 2025 तक 25 MW से अधिक क्षमता वाली परियोजनाओं के लिए बेसिनवार विकास की स्थिति दी गई है।

नदी-बेसिनसंचालित/विकसित क्षमता (%)निर्माणाधीन (%)विकसित + निर्माणाधीन (%)शेष संभावित क्षमता (%)
सिंधु बेसिन47.5115.4862.9937.01
गंगा बेसिन36.868.1144.9155.09
मध्य भारतीय नदी तंत्र70.24070.2429.76
पश्चिम की ओर बहने वाली प्रायद्वीपीय नदियाँ82.610.5783.1816.82
पूर्व की ओर बहने वाली प्रायद्वीपीय नदियाँ73.210.5683.7616.24
ब्रह्मपुत्र बेसिन7.479.1516.6283.38
भारत का कुल32.229.9241.5458.46

नोट: पश्चिम की ओर बहने वाली प्रायद्वीपीय नदियों और पूर्व की ओर बहने वाली प्रायद्वीपीय नदियों की पहचानी गई क्षमता का बड़ा हिस्सा विकसित हो चुका है या निर्माणाधीन है। इसके विपरीत, ब्रह्मपुत्र बेसिन में 83.38% क्षमता शेष होने का अर्थ है कि इस बेसिन में विकास की बड़ी संभावनाएँ हैं। लेकिन दुर्गम भूभाग, भूकंपीय सक्रियता, पारिस्थितिक संवेदनशीलता और परियोजना लागत इसके विकास को चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।

भारत की प्रमुख जल विद्युत परियोजनाएँ

उत्तर भारत एवं हिमालयी क्षेत्र
क्र.जल विद्युत परियोजनानदीराज्य/केंद्रशासित प्रदेशस्थापित क्षमता (लगभग)
1भाखड़ासतलुजहिमाचल प्रदेश–पंजाब1,325 MW
2नाथपा झाकड़ीसतलुजहिमाचल प्रदेश1,500 MW
3रामपुरसतलुजहिमाचल प्रदेश412 MW
4पोंग बाँधब्यासहिमाचल प्रदेश396 MW
5पंडोह–देहर जल विद्युत प्रणालीब्यासहिमाचल प्रदेशदेहर: 990 MW
6चमेरा-Iरावीहिमाचल प्रदेश540 MW
7चमेरा-IIरावीहिमाचल प्रदेश300 MW
8बaira सिउलबुढ़िलहिमाचल प्रदेश180 MW
9टिहरीभागीरथीउत्तराखंड1,000 MW
10कोटेश्वरभागीरथीउत्तराखंड400 MW
11मनेरी भाली-Iभागीरथीउत्तराखंड90 MW
12मनेरी भाली-IIभागीरथीउत्तराखंड304 MW
13धौलीगंगाधौलीगंगाउत्तराखंड280 MW
14टनकपुरशारदा/कालीउत्तराखंड120 MW
15रामगंगारामगंगाउत्तराखंड198 MW
16सलालचिनाबजम्मू-कश्मीर690 MW
17दुलहस्तीचिनाबजम्मू-कश्मीर390 MW
18बगलिहार-I एवं IIचिनाबजम्मू-कश्मीर900 MW
19रतलेचिनाबजम्मू-कश्मीर850 MW
20उरी-Iझेलमजम्मू-कश्मीर480 MW
21उरी-IIझेलमजम्मू-कश्मीर240 MW
22किशनगंगाकिशनगंगा/नीलमजम्मू-कश्मीर330 MW
23पाकल दुलमरुसुदरजम्मू-कश्मीर1,000 MW
24निमू-बाजगोसिंधुलद्दाख45 MW
प्रायद्वीपीय भारत की प्रमुख परियोजनाएँ
क्र.जल विद्युत परियोजनानदीराज्यस्थापित क्षमता (लगभग)
25शिवनासमुद्रमकावेरीकर्नाटकऐतिहासिक केंद्र
26शरावतीशरावतीकर्नाटक1,035 MW
27महात्मा गांधी/जोग जल विद्युत केंद्रशरावतीकर्नाटकऐतिहासिक केंद्र
28काली नदी परियोजनाकालीकर्नाटक1,200 MW से अधिक, विभिन्न परियोजनाएँ
29कृष्णराज सागर से संबद्ध जल विद्युत केंद्रकावेरीकर्नाटकऐतिहासिक महत्त्व
30अलमट्टीकृष्णाकर्नाटकलगभग 290 MW
31नागार्जुन सागरकृष्णातेलंगाना–आंध्र प्रदेश816 MW
32श्रीशैलमकृष्णातेलंगाना–आंध्र प्रदेशलगभग 1,670 MW
33लोअर सिलेरूसिलेरूआंध्र प्रदेशलगभग 460 MW
34मचकुंडमचकुंडआंध्र प्रदेश–ओडिशा क्षेत्रलगभग 120 MW
35इंदिरा सागरनर्मदामध्य प्रदेश1,000 MW
36ओंकारेश्वरनर्मदामध्य प्रदेश520 MW
37गांधी सागरचंबलमध्य प्रदेश115 MW
38बाणसागरसोनमध्य प्रदेशलगभग 425 MW
39सरदार सरोवरनर्मदागुजरात1,450 MW
40उकाईतापीगुजरात300 MW
41कड़ानामाहीगुजरात240 MW के आसपास
42कोयनाकोयनामहाराष्ट्रलगभग 1,960 MW
43भिराकुंडलिका/पश्चिमी घाट का जल तंत्रमहाराष्ट्रलगभग 300 MW
44वैतरणावैतरणामहाराष्ट्रलगभग 60 MW
45इडुक्कीपेरियारकेरल780 MW
46सबरीगिरिपंबा–कक्की नदी तंत्रकेरल340 MW के आसपास
47पल्लिवासलमुदिरापुझाकेरललगभग 37 MW
48पायकारापायकारातमिलनाडुलगभग 150 MW
49कुंडाहकुंडाह नदी तंत्रतमिलनाडुलगभग 500 MW
50मेट्टूरकावेरीतमिलनाडुलगभग 200 MW
51पापनासमतामिरापरणीतमिलनाडुलगभग 28 MW
पूर्वी भारत एवं उत्तर-पूर्वी भारत
क्र.जल विद्युत परियोजनानदीराज्यस्थापित क्षमता (लगभग)
52हीराकुंडमहानदीओडिशालगभग 347 MW
53बालिमेलासिलेरूओडिशा510 MW
54रेंगालीब्राह्मणीओडिशालगभग 250 MW
55तिलैयाबराकरझारखंडलगभग 4 MW
56पंचेतदामोदरझारखंड–पश्चिम बंगाल क्षेत्रलगभग 40 MW
57मैथनबराकरझारखंड–पश्चिम बंगाल क्षेत्रलगभग 60 MW
58तीस्ता-Vतीस्तासिक्किम510 MW
59रंगितरंगितसिक्किम60 MW
60लोकटकलोकटक झील/इंफाल नदी तंत्रमणिपुर105 MW
61उमियमउमियममेघालयलगभग 185 MW, चरणों सहित
62दोयांगदोयांगनागालैंड75 MW
63रंगानदीरंगानदीअरुणाचल प्रदेश405 MW
64कामेंगकामेंगअरुणाचल प्रदेश600 MW
65सुबनसिरी लोअरसुबनसिरीअरुणाचल प्रदेश–असम2,000 MW
66दिबांग बहुउद्देशीय परियोजनादिबांगअरुणाचल प्रदेश2,880 MW; निर्माणाधीन
67तीस्ता-VIतीस्तासिक्किम500 MW; निर्माणाधीन
68पकल दुलमरुसुदरजम्मू-कश्मीर1,000 MW; निर्माणाधीन
69किरूचिनाबजम्मू-कश्मीर624 MW; निर्माणाधीन
70क्वारचिनाबजम्मू-कश्मीर540 MW; निर्माणाधीन

भारत की वर्तमान जल विद्युत स्थापित क्षमता

विद्युत मंत्रालय द्वारा लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, 31 जनवरी 2026 को भारत की बड़ी जल विद्युत स्थापित क्षमता 51,165 MW थी। देश की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 5,20,511 MW थी। इस आधार पर बड़ी जल विद्युत क्षमता का हिस्सा कुल स्थापित क्षमता का लगभग 9.8% था। लघु जल विद्युत को सरकारी आँकड़ों में अलग श्रेणी में भी दिखाया जाता है।

संकेतकक्षमता
भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता5,20,511 MW
बड़ी जल विद्युत स्थापित क्षमता51,165 MW
बड़ी जल विद्युत का कुल स्थापित क्षमता में हिस्सालगभग 9.8%
लघु जल विद्युत की स्थापित क्षमतालगभग 5,159 MW

भारत में जल विद्युत का महत्त्व

1. नवीकरणीय बिजली: पानी के प्रवाह से बिजली उत्पन्न होती है और सामान्य संचालन के दौरान कोयला आधारित संयंत्रों की तरह ईंधन जलाने की आवश्यकता नहीं होती।

2. पीक-लोड आपूर्ति: जलाशय आधारित परियोजनाएँ बिजली की माँग बढ़ने पर उत्पादन बढ़ाने में मदद कर सकती हैं।

3. ग्रिड संतुलन: सौर और पवन ऊर्जा के उत्पादन में उतार-चढ़ाव होने पर जल विद्युत प्रणाली को संतुलित करने में सहायक हो सकती है।

4. सिंचाई और जल प्रबंधन: बहुउद्देशीय बाँध बिजली के अतिरिक्त सिंचाई, पेयजल और बाढ़ प्रबंधन में भूमिका निभा सकते हैं।

5. क्षेत्रीय विकास: दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क, संचार और अन्य आधारभूत सुविधाओं के विकास को बढ़ावा मिल सकता है।

जल विद्युत विकास की प्रमुख चुनौतियाँ

  • पर्यावरणीय प्रभाव: बाँधों और जलाशयों से वन, जैव विविधता, नदी के प्राकृतिक प्रवाह और स्थानीय पारिस्थितिकी पर असर पड़ सकता है।
  • विस्थापन: बड़े जलाशयों के कारण गाँवों, कृषि भूमि और स्थानीय समुदायों का पुनर्वास आवश्यक हो सकता है।
  • भूगर्भीय जोखिम: हिमालय जैसे भूकंपीय रूप से सक्रिय क्षेत्रों में भूस्खलन, भूकंप और चट्टानों की अस्थिरता परियोजनाओं को प्रभावित कर सकती है।
  • नदी के प्रवाह में परिवर्तन: जल प्रवाह में बदलाव से नीचे की ओर स्थित पारिस्थितिकी, मत्स्य संसाधन और नदी पर निर्भर समुदाय प्रभावित हो सकते हैं।
  • जलवायु परिवर्तन: वर्षा की अनिश्चितता, हिमनदों में परिवर्तन, सूखा और अचानक बाढ़ बिजली उत्पादन की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकते हैं।
  • उच्च लागत और लंबा निर्माण काल: सुरंगों, बाँधों, सड़कों और कठिन भूभाग में निर्माण के कारण परियोजनाएँ महँगी तथा समय लेने वाली हो सकती हैं।

इसलिए जल विद्युत परियोजनाओं की योजना बनाते समय बिजली की आवश्यकता के साथ पर्यावरणीय प्रवाह, भूस्खलन जोखिम, स्थानीय समुदायों के अधिकार और नदी-बेसिन के समग्र प्रबंधन को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

FAQs

प्रश्न 1. भारत का पहला जल विद्युत केंद्र कहाँ स्थापित किया गया था? 

उत्तर: सिद्रापोंग जल विद्युत केंद्र 1897 में दार्जिलिंग में स्थापित किया गया था। इसकी प्रारंभिक क्षमता लगभग 130 किलोवाट थी।

प्रश्न 2. भारत में जल विद्युत की सर्वाधिक संभावित क्षमता किस राज्य में है? 

उत्तर: CEA के 2017–2023 पुनर्मूल्यांकन के राज्यवार विवरण में अरुणाचल प्रदेश की संभावित बड़ी जल विद्युत क्षमता 50,394 MW है, जो राज्यों में सर्वाधिक है।

प्रश्न 3. जल विद्युत और पम्प्ड स्टोरेज परियोजना में क्या अंतर है? 

उत्तर: सामान्य जल विद्युत परियोजना पानी की ऊर्जा से बिजली बनाती है। पम्प्ड स्टोरेज परियोजना कम माँग के समय पानी को ऊँचाई पर पम्प करके संग्रहित करती है और माँग बढ़ने पर उसी पानी से बिजली बनाकर ऊर्जा भंडारण में सहायता करती है।

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