भारत में लौह-अयस्क (Iron Ore in India)

भारत विश्व का लगभग 12 प्रतिशत लोहे का उत्पादन करके विश्व में चौथे स्थान पर है। भारत का अधिकांश लोहा उच्च कोटि (हैमेटाइट) का है। अपितु अति उच्च कोटि (मैग्नेटाइट) के लौह संसाधन अपेक्षाकृत कम हैं और छत्तीसगढ़ के बैलाडीला, कर्नाटक के विलोरी-हॉस्पेट तथा झारखंड-उड़ीसा के बड़ा जमादा क्षेत्र तक ही सीमित हैं। 2021-22 के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल 2,53,974 हजार टन लौह-अयस्क का उत्पादन किया गया। भारत में अधिकतर लौह – अयस्क का उत्पादन मध्य-पूर्वी भाग में ही होता है। पिछले कुछ वर्षों के आंकडों से पता चलता है कि भारत में लोहे के उत्पादन में निरन्तर वृद्धि हो रही है।
भारत में परमाणु ऊर्जा (Atomic Energy in India)

भारत में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की शुरुआत 10 अगस्त, 1948 को परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) की स्थापना से हुई। इसी आयोग के तहत 1954 में परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) और परमाणु ऊर्जा संस्थान, ट्राम्बे (1967 में भाभा परमाणु शोध केन्द्र BARC) अस्तित्व में आए। देश में परमाणु विद्युत गृहों के निर्माण, संचालन और देखरेख के लिए 1987 में भारतीय परमाणु विद्युत निगम (NPCIL) का गठन किया गया। वर्तमान में NPCIL के अधीन देश के 23 शक्ति गृह हैं जिनकी कुल स्थापित क्षमता 7480 मेगावाट विद्युत उत्पादन की है।
भारत में जल विद्युत् शक्ति (Hydroelectric Power in India): उत्पादन एवं वितरण

भारत में प्रथम जलविद्युत संयंत्र की स्थापना 1897-98 में दार्जिलिंग में की गई (स्थापित क्षमता 200 kw)। इसके बाद दूसरा जल विद्युत संयंत्र 1902 में शिवसमुद्रम के निकट कावेरी नदी पर कोलार की सोने की खानों को बिजली देने के लिए बनाया गया (क्षमता 4200 kw) | तीसरा केन्द्र झेलम नदी पर मोहारा के निकट 1909 में स्थापित हुआ (क्षमता 4500 kw) |
जल-विद्युत उत्पादन के लिए आवश्यक दशाएँ (Conditions Required for Hydroelectric Power Generation)

जल-विद्युत उत्पादन के लिए आवश्यक दशाएँ निम्नलिखित हैं
पर्याप्त वर्षा
सुनिश्चित जल-पूर्ति
उच्चावच
स्वच्छ जल
तापमान
माँग
ऊर्जा के अन्य साधनों का अभाव
सस्ता कच्चा माल
पूँजी एवं तकनीकी ज्ञान
विद्युत शक्ति के प्रयोग से लाभ (Benefits of Using Electric Power)

ज के वैज्ञानिक युग में विद्युत शक्ति का बहुत अधिक महत्व है। आज किसी देश का जीवन-स्तर वहाँ पर विद्युत के उत्पादन तथा प्रयोग से मापा जाता है। विद्युत शक्ति उपलब्ध होने का अर्थ अधिक उद्योग, परिवहन, कृषि उपज तथा अधिक समृद्धि है। हमारे घरों को रात्रि के समय विद्युत ही प्रकाश देती है।
हरित क्रान्ति के दोष (Demerits of Green Revolution)

हरित क्रान्ति की सफलता को लेकर अलग-अलग विद्वानों के अपने मत है। कुछ विद्वान तो इसे पूर्ण रूप से सफल क्रान्ति मानते हैं, जिसने भारत के साथ कई अन्य विकासशील देशों में भी कृषि उत्पादन में सचमुच ही क्रान्ति ला दी। परन्तु कुछ अन्य विद्वानों का मानना है कि हरित क्रान्ति से उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं मिल पाए और इससे आर्थिक, सामाजिक तथा क्षेत्रीय विषमताएँ बढ़ी हैं।
हरित क्रान्ति के प्रभाव (Effects of Green Revolution)

हरित क्रान्ति के प्रभाव (Effects of Green Revolution)
1. कृषि उत्पादन में वृद्धि
2. किसानों की समृद्धि
3. खाद्यान्नों के आयात में कमी
4. पूँजीवादी खेती (Capitalistic Farming)
5. लाभ का पुनर्निवेश (Ploughing Back of Profits)
6. उद्योगों का विकास
7. मूल्यों पर प्रभाव (Effect on Prices)
8. ग्रामीण रोजगार पर प्रभाव
9. किसानों की विचाराधारा में परिवर्तन
भारत में हरित क्रान्ति (Green Revolution in India)

भारत में हरित क्रान्ति की शुरुआत 1966-67 में मेक्सिको में विकसित नई गेहूँ की बौनी प्रजातियों के प्रयोग से हुयी। इसके पहले 1959 में फोर्ड फाउन्डेशन के कृषि वैज्ञानिकों के एक समूह को भारत की कृषि में सुधार हेतु समुचित सुझाव देने के लिए आमंत्रित किया गया था जिन्होंने अपनी रिपोर्ट अप्रैल 1959 में प्रस्तुत की थी।
भारतीय कृषि की 20 समस्याएं (Problems of Indian Agriculture)

देखा जाए तो कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की आधार है और देश की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या कृषि पर ही निर्भर है फिर भी भारतीय कृषि कई समस्याओं से ग्रसित है और कुछ समस्याएं टो समय बीतने के साथ और भी जटिल होती जा रही हैं। स्वतंत्रता के तुरंत बाद योजनाबद्ध विकास के बावजूद भी कृषि संबंधी समस्याओं को सुलझाने में कोई विशेष सफलता नहीं मिली है। आइए यहां हम भारतीय कृषि से जुडी कुछ गंभीर समस्याओं की चर्चा करते हैं।
भारतीय कृषि की विशेषताएँ (Characteristics of Indian Agriculture)

हम सब जानते हैं कि भारत मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान देश है जिसमें लोगों के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में कृषि की प्रमुख भूमिका रहती है। कृषि का प्रभाव इस हद तक देखा जा सकता है कि राजनीतिक दल का भविष्य और सरकार की सफलता भी कृषि उत्पादन की मात्रा और जन साधारण के लिए सस्ते दाम पर अनाजों की उपलब्धता पर निर्भर करती है। आइए अब हम भारतीय कृषि की कुछ प्रमुख विशेषताओं पर नजर डालते हैं।
भारत में तेल परिष्करणशालाएँ (Oil Refineries in India)

कच्चे तेल की खोज के बाद भारतीय पेट्रोलियम रिफाइनिंग क्षेत्र(Indian Petroleum refining sector) ने एक लंबा सफर तय किया है। भारत्त में पहली रिफाइनरी 1901 में डिगबोई में स्थापित की गई। सन 1947 तक, डिगबोई 0.50 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MMTPA) की क्षमता वाली एकमात्र रिफाइनरी थी।
भारत में पेट्रोलियम (Petroleum in India): उत्पादन एवं वितरण

‘पेट्रोलियम’ शब्द लेटिन भाषा के दो शब्दों के मेल से बना है – ‘पेट्रा’ जिसका अर्थ होता है ‘चट्टान’ तथा ‘ओलियम’ जिसका अर्थ है ‘तेल’ । अर्थात् पेट्रोलियम पृथ्वी की चट्टानों से प्राप्त होने वाला तेल है। इसलिए इसे ‘खनिज तेल’ भी कहते हैं।
भारत में कोयले का उत्पादन एवं वितरण (Production and Distribution of Coal in India)

कोयले की संचित राशि की दृष्टि से भारत विश्व का पांचवाँ बड़ा देश जहाँ विश्व का लगभग 10% कोयले की संचित राशि है। भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग के अनुसार 01.04.2022 तक भारत में 1200 मीटर की गहराई तक कोयले की संचित राशि 361411.46 मिलियन टन थी। इसका वितरण तालिका 1 में दिखाया गया है।
भारतीय मानसून एवं संबंधित सिद्धांत (Indian Monsoon and Related Theories)

‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के शब्द ‘मौसिम’ से हुई है जिसका अर्थ है ‘मौसम’ या ‘ऋतु’। इस शब्द का प्रयोग अरब के नाविकों द्वारा अरब सागर क्षेत्र में चलने वाली उन हवाओं के लिए किया गया था, जिनकी दिशा मौसम या ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ बदल जाती थी, अर्थात् जाड़े में हवाएं उत्तर-पूर्व से दक्षिण- पश्चिम को और गर्मी में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर – पूर्व दिशा में बहने लग जाती थी।
भारतीय वानिकी की समस्याएँ (Problems of Indian Forestry)

यद्यपि देश के पास प्रचुर और विविध वन संसाधन उपलब्ध हैं परन्तु वैज्ञानिक नियोजन के अभाव, शोषण की देशी पद्धति और कुप्रबन्ध के कारण वार्षिक उपज बहुत कम है। जहाँ प्रति हेक्टेयर वन क्षेत्र में वार्षिक उत्पादकता स्तर फ्रांस में 3.9 घन मीटर, जापान में 1.8 घनमीटर, संयुक्त राज्य अमेरिका में 1.25 घन मीटर लकड़ी है वहाँ भारत में यह केवल 0.5 घन मीटर है। हर प्रयासों के बावजूद प्रतिवर्ष प्रति हेक्टेयर साल के वन से 6.8 टन, देवदार से 10.1 टन और चीड़ से 3.2 टन से ज्यादा लकड़ी नहीं प्राप्त हो पाती है।