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भारत में जल विद्युत् शक्ति (Hydroelectric Power in India): उत्पादन एवं वितरण

Hydroelectric Power in India

भारत में प्रथम जलविद्युत संयंत्र की स्थापना 1897-98 में दार्जिलिंग में की गई (स्थापित क्षमता 200 kw)। इसके बाद दूसरा जल विद्युत संयंत्र 1902 में शिवसमुद्रम के निकट कावेरी नदी पर कोलार की सोने की खानों को बिजली देने के लिए बनाया गया (क्षमता 4200 kw) | तीसरा केन्द्र झेलम नदी पर मोहारा के निकट 1909 में स्थापित हुआ (क्षमता 4500 kw) | 

जल-विद्युत उत्पादन के लिए आवश्यक दशाएँ (Conditions Required for Hydroelectric Power Generation)

जल-विद्युत उत्पादन के लिए आवश्यक दशाएँ

जल-विद्युत उत्पादन के लिए आवश्यक दशाएँ निम्नलिखित हैं
पर्याप्त वर्षा
सुनिश्चित जल-पूर्ति
उच्चावच
स्वच्छ जल
तापमान
माँग
ऊर्जा के अन्य साधनों का अभाव
सस्ता कच्चा माल
पूँजी एवं तकनीकी ज्ञान

विद्युत शक्ति के प्रयोग से लाभ (Benefits of Using Electric Power)

विद्युत शक्ति के प्रयोग से लाभ

ज के वैज्ञानिक युग में विद्युत शक्ति का बहुत अधिक महत्व है। आज किसी देश का जीवन-स्तर वहाँ पर विद्युत के उत्पादन तथा प्रयोग से मापा जाता है। विद्युत शक्ति उपलब्ध होने का अर्थ अधिक उद्योग, परिवहन, कृषि उपज तथा अधिक समृद्धि है। हमारे घरों को रात्रि के समय विद्युत ही प्रकाश देती है।

हरित क्रान्ति के दोष (Demerits of Green Revolution)

हरित क्रान्ति के दोष (Demerits of Green Revolution)

हरित क्रान्ति की सफलता को लेकर अलग-अलग विद्वानों के अपने मत है। कुछ विद्वान तो इसे पूर्ण रूप से सफल क्रान्ति मानते हैं, जिसने भारत के साथ कई अन्य विकासशील देशों में भी कृषि उत्पादन में सचमुच ही क्रान्ति ला दी। परन्तु कुछ अन्य विद्वानों का मानना है कि हरित क्रान्ति से उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं मिल पाए और इससे आर्थिक, सामाजिक तथा क्षेत्रीय विषमताएँ बढ़ी हैं।

हरित क्रान्ति के प्रभाव (Effects of Green Revolution)

हरित क्रान्ति के प्रभाव

हरित क्रान्ति के प्रभाव (Effects of Green Revolution)
1. कृषि उत्पादन में वृद्धि
2. किसानों की समृद्धि
3. खाद्यान्नों के आयात में कमी
4. पूँजीवादी खेती (Capitalistic Farming)
5. लाभ का पुनर्निवेश (Ploughing Back of Profits)
6. उद्योगों का विकास
7. मूल्यों पर प्रभाव (Effect on Prices)
8. ग्रामीण रोजगार पर प्रभाव
9. किसानों की विचाराधारा में परिवर्तन

भारत में हरित क्रान्ति (Green Revolution in India)

हरित क्रान्ति की मुख्य विशेषताएँ

भारत में हरित क्रान्ति की शुरुआत 1966-67 में मेक्सिको में विकसित नई गेहूँ की बौनी प्रजातियों के प्रयोग से हुयी। इसके पहले 1959 में फोर्ड फाउन्डेशन के कृषि वैज्ञानिकों के एक समूह को भारत की कृषि में सुधार हेतु समुचित सुझाव देने के लिए आमंत्रित किया गया था जिन्होंने अपनी रिपोर्ट अप्रैल 1959 में प्रस्तुत की थी।

भारतीय कृषि की 20 समस्याएं (Problems of Indian Agriculture)

भारतीय कृषि की समस्याएँ

देखा जाए तो कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की आधार है और देश की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या कृषि पर ही निर्भर है फिर भी भारतीय कृषि कई समस्याओं से ग्रसित है और कुछ समस्याएं टो समय बीतने के साथ और भी जटिल होती जा रही हैं। स्वतंत्रता के तुरंत बाद योजनाबद्ध विकास के बावजूद भी कृषि संबंधी समस्याओं को सुलझाने में कोई विशेष सफलता नहीं मिली है। आइए यहां हम भारतीय कृषि से जुडी कुछ गंभीर समस्याओं की चर्चा करते हैं।

भारतीय कृषि की विशेषताएँ (Characteristics of Indian Agriculture)

भारतीय कृषि की विशेषताएँ

हम सब जानते हैं कि भारत मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान देश है जिसमें लोगों के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में कृषि की प्रमुख भूमिका रहती है। कृषि का प्रभाव इस हद तक देखा जा सकता है कि राजनीतिक दल का भविष्य और सरकार की सफलता भी कृषि उत्पादन की मात्रा और जन साधारण के लिए सस्ते दाम पर अनाजों की उपलब्धता पर निर्भर करती है। आइए अब हम भारतीय कृषि की कुछ प्रमुख विशेषताओं पर नजर डालते हैं।

भारत में तेल परिष्करणशालाएँ (Oil Refineries in India)

Oil Refineries in India

कच्चे तेल की खोज के बाद भारतीय पेट्रोलियम रिफाइनिंग क्षेत्र(Indian Petroleum refining sector) ने एक लंबा सफर तय किया है। भारत्त में पहली रिफाइनरी 1901 में डिगबोई में स्थापित की गई। सन 1947 तक, डिगबोई  0.50 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MMTPA) की क्षमता वाली एकमात्र रिफाइनरी थी।

भारत में पेट्रोलियम (Petroleum in India): उत्पादन एवं वितरण

Oil Refinery

‘पेट्रोलियम’ शब्द लेटिन भाषा के दो शब्दों के मेल से बना है – ‘पेट्रा’ जिसका अर्थ होता है ‘चट्टान’ तथा ‘ओलियम’ जिसका अर्थ है ‘तेल’ । अर्थात् पेट्रोलियम पृथ्वी की चट्टानों से प्राप्त होने वाला तेल है। इसलिए इसे ‘खनिज तेल’ भी कहते हैं।

भारत में कोयले का उत्पादन एवं वितरण (Production and Distribution of Coal in India)

Distribution of coal in India

कोयले की संचित राशि की दृष्टि से भारत विश्व का पांचवाँ बड़ा देश जहाँ विश्व का लगभग 10% कोयले की संचित राशि है। भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग के अनुसार 01.04.2022 तक भारत में 1200 मीटर की गहराई तक कोयले की संचित राशि 361411.46 मिलियन टन थी। इसका वितरण तालिका 1 में दिखाया गया है।

भारतीय मानसून एवं संबंधित सिद्धांत (Indian Monsoon and Related Theories)

Monsoon winds in summer in india

‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के शब्द ‘मौसिम’ से हुई है जिसका अर्थ है ‘मौसम’ या ‘ऋतु’। इस शब्द का प्रयोग अरब के नाविकों द्वारा अरब सागर क्षेत्र में चलने वाली उन हवाओं के लिए किया गया था, जिनकी दिशा मौसम या  ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ बदल जाती थी, अर्थात् जाड़े में हवाएं उत्तर-पूर्व से दक्षिण- पश्चिम को और गर्मी में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर – पूर्व दिशा में बहने लग जाती थी।

भारतीय वानिकी की समस्याएँ (Problems of Indian Forestry)

Deforestation

यद्यपि देश के पास प्रचुर और विविध वन संसाधन उपलब्ध हैं परन्तु वैज्ञानिक नियोजन के अभाव, शोषण की देशी पद्धति और कुप्रबन्ध के कारण वार्षिक उपज बहुत कम है। जहाँ प्रति हेक्टेयर वन क्षेत्र में वार्षिक उत्पादकता स्तर फ्रांस में 3.9 घन मीटर, जापान में 1.8 घनमीटर, संयुक्त राज्य अमेरिका में 1.25 घन मीटर लकड़ी है वहाँ भारत में यह केवल 0.5 घन मीटर है। हर प्रयासों के बावजूद प्रतिवर्ष प्रति हेक्टेयर साल के वन से 6.8 टन, देवदार से 10.1 टन और चीड़ से 3.2 टन से ज्यादा लकड़ी नहीं प्राप्त हो पाती है।

सामाजिक वानिकी (Social Forestry)

Community Forestry

सामाजिक वानिकी शब्दावली का प्रयोग सबसे पहले 1976 के राष्ट्रीय कृषि आयोग ने किया था। इसका उद्देश्य ग्रामीण जनसंख्या के लिए जलावन, छोटी इमारती लकड़ी तथा छोटे-छोटे पन उत्पादों की आपूर्ति करना है। इसके मुख्य तीन अंग है-

(1) शहरी वानिकी, (ii) ग्रामीण यानिकी तथा (iii) फार्म वानिकी

एच.जी. चैम्पियन के अनुसार भारतीय वनों का वर्गीकरण (Indian Forests Classification by H.G. Champion)

भारतीय वनों को एच.जी. चैम्पियन (1936) ने ग्यारह वर्गों में विभाजित किया है। ये वर्ग निम्नलिखित हैं-
1. उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests)
2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन (The Tropical Moist Deciduous Forest)
3. उष्णकटिबंधीय कटीले वन (Tropical Thorny Forests)
4. उपोष्ण पर्वतीय वन (The Subtropical Montane Forests)
5. शुष्क पर्णपाती वन (The Dry Deciduous Forests)
6. हिमालय के आर्द्र वन (Himalayan Moist Forests)
7. हिमालय के शुष्क शीतोष्ण वन (Dry Temperate Forests of the Himalayas)
8. पर्वतीय आर्द्र शीतोष्ण वन (Montane Wet Temperate Forests)
9. अल्पाईन तथा अर्ध-अल्पाईन वन (Alpine and Subalpine Forests)
10. मरुस्थल वनस्पति (Desert Vegetation)
11. ज्वारीय (कच्छ वनस्पति) (Tidal (Mangrove)